डर के आगे जीत

Fear is only inside, just come out of it and you can touch the sky, and the world will still remain the same.

जी हां हम हजारों बार अपने ही बनाए दायरों में उलझे रहते हैं कयी बार सही कयी बार गलत, हमें तय करने की जरूरत है कि कौनसा दायरा हमारी उन्नति में सहायक है और कहां हमें परिवर्तन की ज़रूरत है वो चाहे समाज/धर्म/परिवार किसी भी नाम पर हो। ज्यादातर तो हम औरतें ही खुद को बांधे रखतीं हैं कभी पुरुषों के खौफ से कभी रिवाज़ों के नाम पर जबकि वास्तविकता यह है कि अधिकतर रिवाज औरत को सीमित करने के लिए बनाए गये हैं, मसलन आदमी पढने और कमाने बाहर जा सकता है परंतु औरत नहीं और ऐसा करने पर इल्जाम घर तोडने का लगाया जाता है।
कभी कभी तो हद होती है जब यह कुतर्क कोई देता है कि घर कि बाकि औरतें खेती करतीं हैं तो आप भी वही करो फिर पुरुष को अलग अलग काम की छूट क्यों तब परिवार का रिवाज कैसे नहीं टूटा?? और एक ही जैसा सबको रखना है तो फिर जो अनपढ हैं उनको पढा दो भाई आपका रिवाज भी नहीं टूटेगा और घर भी आगे बढेगा।
🤔🤔
मेरी छोटी समझ के अनुसार परिवार चाहे एकल हो या संयुक्त खुश तभी रह सकता है जब सभी सदस्यों को अपनी मर्जी से जीने की छूट हो कुछ बेसिक दायरे में जैसे कि किसी एक की इच्छा न थोपी जाए, किसी का साथ दो तो ठीक पीछे न धकेले, एक जेंडर को दूसरे की खुशी के लिए आगे बढने से न रोका जाए क्योंकि दोंनों साथ आगे बढेंगे तो परिवार की एकता और बढेगी वर्ना एक सोचेगा कैसे इसे दबाऊं और दूसरा रो रो कर सपनों को मारकर ज़िंदा लाश बन जाएगा और दोंनों आपस में कभी भी जुड नहीं पाएंगे।
और एक बात अगर पति आगे जाता है तो अच्छी बात है लेकिन पत्नी आगे जाती है तो भी उतनी ही अच्छी बात है ये भी समझने की और गर्व महसूस करने की बात है।
आज हम पत्नी और बहु का साथ देंगे तभी कल हमारी बेटियाँ निडर हो सुरक्षित समाज में बेटों के बाराबर बढ सकेंगी।
और एक बात जो समाज के सबसे कायर लोग करते हैं, बहु बाहर जा रही है तो उसके चरित्र पर शक और लांछन लगा उसे नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं अरे ऐसा हमारे समाज में हो रहा है तभी तो बेटे फिर दिमाग को आगे बढने में न लगाकर कुंठित होकर या तो नशा करते हैं या पोर्न देखते हैं या अपराध करते हैं और फिर घरेलु हिंसा को बढाते हैं सो अलग।
क्योंकि समानता, स्वतंत्रता और प्यार प्रकृति का नियम है जिससे इतर जाते ही हम कुंठाग्रस्त हो जाते हैं, कारण यह कि इससे अलग हम तभी होते हैं जब सत्ता दिमाग मे आती है वो फिर चाहे पुरूष की औरत पर हो या धर्म की या कही और जब एक आदमी दूसरे को रिवाज के नाम पर डराता है और अंकुश में रखना चाहता है तब वो अपने मन को खोल नहीं पाता है और तब वो क्रूर, निष्ठुर और अन्यायी बन जाता है ऐसे में थोडा पैसा और हो तो उसका दंभ फिर सिर्फ प्रकृति ही तोडती है।
खैर, बहरहाल हमारा मुद्दा है डर उसको हम बढाएंगे उतना ही बढेगा अच्छा है पहले ही तोडदो।
समझने के लिए दो वास्तविक जीवन की कहानियां यहां पढ सकते हैं –

एक बच्ची थी उसके पिताजी मानते थे कि बच्ची पढ तो सकती है लेकिन गाडी नहीं चला सकती लेकिन भाई और मां ने साथ दिया और चुपके से सिखाया पिछले महीने उनको कोरोना हुआ भाई विदेश में था और वो ससुराल, पता चलते ही पति ने उसे पिता के पास जाने से नहीं टोका और रात ही को वो गाडी चलाकर आयी तुरंत पिता को भर्ती कराया अभी वो स्वस्थ होकर घर भी आ गये।
तब पिता ने सबको बताया कि परिवर्तन जरूरी है और बेटियों का संबल होना भी।

दूसरी कहानी पिछले साल की है-
इसमें दो भाई होते हैं और उनका व पिता का मानना है कि बहु घर पर ही रहनी चाहिए छोटी बहु रह गयी क्योंकि उसने ऐसे ही देखा था पर बड़ी का परिवार पढा लिखा था तो उसकी नौकरी की जिद्द थी पति को तो मनाया पर चाचा और पिता ने बेटे से कहा कि घर से अलग हो जाओ अगर पत्नी से नौकरी करानी है तो उसने मारपीट शुरू कर दी और पत्नी को चुप कराया।
बेचारी पत्नी घर न टूटे इसलिए सपने मारकर, रोकर जीती रही, पति का भी यही डर रहा कि परंपरा तोडी तो पता नहीं क्या होगा।
अब उसके दो बेटियां हो गयीं तीसरा बच्चा करे तो नौकरी जाए तो इनको ही पढाना शुरू किया 12वीं तक तो सब ठीक रहा फिर पिता ने फिर से नौटंकी शुरु कर दी साथ चाचा ने भी दिया। बेटियाँ होशियार थीं मगर पिता के डर ने रोक दिया। तीन साल बाद चाचा की पोती ने भी 12वीं कर ली और बेटी को बाहर पढने भी भेज दिया क्योंकि ये बंदा सुलझा हुआ था डर के ऊपर था। इसने अपने पिता और ताऊ से कहा ठीक है अलग कर दो पर मैं तो अपने बच्चों को पढाऊंगा ऐसे ही उसने पहले अपनी बीवी को नौकरी करने में भी साथ दिया था।

तब सब चुप होकर उसके साथ सहमत हो गये। इससे सीख ये मिली कि ये सब प्यार तो एक दूसरे से तब भी करते थे और आज भी करते हैं, और परिवार आज भी नहीं टूटा।

लेकिन पहले वाले भाई ने रूढियों और बेवजह के डर के चक्कर में बेटियों को अंधकार में धकेल दिया। और बीवी बच्चों से दूरी बनाकर रखी। जिससे वो सबसे अलग थलग रहा। खुद भी परेशान बाकि सब भी।

जबकि चचेरे भाई ने डर से आगे जाकर जीत हासिल की और अपने बीवी बच्चों और माता पिता ताऊ सबके करीब भी रहा और खुशहाल जीवन जिया।

अब आप (मेरे बंधु जो मेरा लेख पढ रहे हैं) ही बताओ डर अच्छा कि डर से आगे बढकर जीत अच्छी।

7 Comments

  1. रचना, डर भले ही मनुष्य के ‘भीतर’ हो, पिंजरे, बाहर, और ‘दूसरों’ द्वारा बनाये गए भी होते हैं. …परन्तु अंतत, डर के पिंजरे से हमें निकलना ही होगा, अन्यथा चैन नहीं! पर इसमें जान भी जा सकती है. यह वही करेंगे जो ‘पर’ लोक से इस आज़ादी को देखने को तैयार हैं! 🙂

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